Tuesday, 24 March 2026

परीक्षा

  

परीक्षा


नादेझ्दा तेफ़ी

 

अनुवाद

आ. चारुमति रामदास


भूगोल की परीक्षा की तैयारी के लिए तीन दिन दिए गए थे. जिनमें से दो मानिच्का ने अपनी टेब्लेट के साथ नए बेल्ट की नाप लेने में व्यर्थ गँवा दिए. तीसरे दिन शाम को पढ़ने के लिए बैठी. किताब खोली, नक्शा खोला और – फ़ौरन समझ गई कि वह बिल्कुल कुछ भी नहीं जानती है. न तो नदियाँ, न पहाड़, न ही शहर, न समुद्र, न खाड़ी – बिल्कुल कुछ भी नहीं. और वे बहुत सारे थे – हर चीज़ किसी न किसी बात के लिए मशहूर थी. हिन्द महासागर टाइफ़ून्स के लिए, व्याज़्मा – जिंजर ब्रेड के लिए, पम्पासी – जंगलों के लिए, ल्यानोसी – स्तेपियों के लिए, वेनिस – नहरों के लिए, चीन – पूर्वजों के प्रति आदर के लिए. सब कुछ मशहूर था! अच्छी प्रसिद्धि घर के भीतर ही रहती है, और बदनामी दुनिया भर में भागती फ़िरती है – और पिन्स्क की दलदल भी बुखार के लिए मशहूर है. ये नाम तो मानिच्का रट भी लेती, मगर प्रसिद्धि के बारे में याद नहीं रख पायेगी. “खुदा, अपनी गुलाम मारिया को भूगोल का इम्तिहान पास करने में मदद कर! और उसने नक़्शे के मार्जिन पर लिखा: ‘खुदा, मदद कर! खुदा मदद कर! खुदा मदद कर!’ तीन बार. फिर उसने सोचा : बारह बार लिखती हूँ, “खुदा मदद कर”, तब इम्तिहान पास कर लूंगी. बारह बार लिखा, मगर आख़िरी लब्ज़ लिखते हुए, उसने खुद ही सोचा: “अहा! खुश हूँ कि पूरा लिख लिया. नहीं, मान! अगर इम्तिहान पास करना है, तो और बारह बार लिख, बल्कि बेहतर होगा पूरे बीस बार. उसने नोट बुक ली, क्योंकि नक़्शे की मार्जिन पर जगह बहुत कम थी, और लिखने बैठ गयी. लिखती और बोलती जाती: “सोच, क्या बीस बार लिखने से इम्तिहान पास कर लोगी? नहीं, प्यारी, पचास बार लिखो! हो सकता है, तभी कुछ बात बने. पचास बार? खुश हो गई कि जल्दी ही पूरा हो जाएगा! आँ? सौ बार, ज़रा भी कम नहीं...कलम थरथरा रही है, और धब्बे गिरा रही है. मानिच्का ने चाय और डिनर से इनकार कर दिया. उसके पास फ़ुर्सत ही नहीं है. जल्दी जल्दी और तनाव में काम करने से उसके गाल जल रहे हैं, वह पूरी थरथरा रही है. रात के तीन बजे दो नोट बुक्स और एक पैड पूरा लिख देने के बाद मेज़ पर ही उसकी आंख लग गई.

 

*****

 

सुन्न और उनींदी, उसने कक्षा में प्रवेश किया. सब लोग आ चुके थे और अपनी उत्तेजना एक दूसरे के साथ बांट रहे थे. – ‘मेरा दिल हर मिनट आधे घंटे के लिए रुक जाता है!” पहली छात्रा ने आंखें गोल-गोल घुमाते हुए कहा.

मेज़ पर परिक्षा के टिकट रखे थे. अत्यंत अनुभवहीन आंख भी उन्हें फ़ौरन चार श्रेणियों में बांट सकती थी : टिकट जो गोल गोल पाईप की भांति मुड़े हुए थे, नाव जैसे, ऊपर उठे हुए कोनों वाले, और नीचे झुके कोनों वाले. मगर संदेहास्पद व्यक्तियों, पिछली बेंचों वालों को, जिन्होंने ये चालाक तरीका बनाया था, यह प्रतीत हुआ, की अभी भी ये सब पर्याप्त नहीँ है, और वे मेज़ के इर्द गिर्द घूम रहे थे, टिकट्स को ठीक करते हुए, जिससे ज़्यादा स्पष्ट दिखाई दे,

-    “मान्या कूक्सिना!” वे चिल्लाए. “तूने कौन से टिकट मुँहजुबानी याद किये हैं? आं? देख, ये सब कैसे होता है! नाव जैसे – पहले पांच टिकट्स हैं, और पाईप जैसे – अगले पांच, और कोनों वाले...” मगर मानिच्का ने पूरी बात नहीं सुनी.  उसने उदासी से सोचा, कि ये सब पढ़ने-लिखने की बातें उसके लिए नहीं बनीं हैं, जिसने एक भी टिकट मुंह जुबानी याद नहीं किया है,” – और उसने गर्व से कहा: “इस तरह दादागिरी करना शर्म की बात है! पढ़ाई अपने लिए करना होती है, न कि नंबर लाने के लिए.”

टीचर आये, बैठ गए, उदासीनता से सारे टिकट्स इकट्ठा किये और, उन्हें करीने से रखकर आपस में मिला दिया. क्लास में हल्की सी कराह गूंजी. परेशान हो गए और ऐसे झूलने लगे, जैसे हवा में रई का पौधा डोलता है. “मैडम कुक्सिना! प्लीज़ यहाँ आईये. मानिच्का ने टिकट उठाया और पढ़ा: “जर्मनी की जलवायु. अमेरिका की प्रकृति. उत्तरी अमेरिका के शहर”...   

“हाँ, मैडम कुक्सिना. आप जर्मनी की जलवायु के बारे में क्या जानती हैं?

मानिच्का ने उसकी तरफ़ ऐसी नज़र से देखा, जैसे कहना चाहती हो, “जानवरों को क्यों सता रहे हो?” – और गहरी सांस लेकर बुदबुदाई: “जर्मनी की जलवायु इस बात के लिए प्रसिद्ध है, कि वहां उत्तर और दक्षिण की जलवायु में ख़ास फ़रक नहीं है, क्योंकि जर्मनी जितना उत्तर की ओर है, उतना ही दक्षिण की तरफ़ भी है...”

टीचर ने भौंह चढ़ाई और मानिच्का के मुंह की तरफ़ देखा. – “तो-,” उसने कुछ देर सोचा और कहा, “आप जर्मनी की जलवायु के बारे में कुछ भी नहीं जानती, मैडम कुक्सिना. बताइये, आप अमेरिका की प्रकृति के बारे में क्या जानती हैं?

मानिच्का ने, अपने ज्ञान के प्रति शिक्षक के अन्यायपूर्ण रवैये से उदास होकर सिर झुकाया और संक्षेप में जवाब दिया: “अमेरिका पम्पास के लिए प्रसिद्ध है.”

शिक्षक खामोश रहा, और मानेच्का ने एक मिनट इंतज़ार करने के बाद आगे कुछ ऊंची आवाज़ में जोड़ा: “और पम्पास, - लानोस के लिए.”

शिक्षक ने ज़ोर से गहरी सांस ली, जैसे जाग गया हो, और भावपूर्ण आवाज़ में बोला:

“बैठ जाईये, मैडम कुक्सिना.”

*****

अगली परीक्षा इतिहास की थी. शांत महिला ने कठोरता से चेतावनी दी: “देखों कुक्सिना! दो-दो पुनः परीक्षाएं तो तुम्हें देने से रहे, इतिहास की तैयारी ठीक तरह से करो, वरना दूसरा साल भी यहीं रुक जाओगी. कैसी शर्म की बात है! अगले पूरे दिन मानेच्का दबाव में रही. दिल बहलाने के लिए आईस्क्रीम वाले से पिस्ते के दस डिब्बे खरीद लिये, और शाम को अपनी इच्छा के विरुद्ध कैस्टर ऑइल पी लिया. मगर अगले दिन, - परिक्षा शुरू होने से एक दिन पूर्व, मार्लिट की दूसरी पत्नी पढ़ते हुए दीवान पर लेटी रही, ताकि दिमाग़ को कुछ आराम दे सके, जो ‘भूगोल’ के कारण बेहद थक गया था. शाम को इलावायस्की को लेकर बैठी डरते-डरते लगातार दस बार लिख डाला: “खुदा, मेहेरबानी...” कड़वाहट से मुस्कुराई और बोली: “दस बार! जैसे खुदा को दस ही बार कहने की ज़रुरत है! डेढ़ सौ बार लिखती तो बात कुछ और होती! सुबह छह बजे बगल वाले कमरे से आंटी ने सुना, कि मानिच्का कैसे अपने आप से दो आवाजों में बात कर रही है. एक आवाज़ कराह रही थी: “अब और ज़्यादा नहीं कर सकती! ओह, नहीं कर सकती! दूसरी आवाज़ ने व्यंग्य से कहा: “आहा! नहीं कर सकती! एक हज़ार छः सौ बार नहीं लिख सकती, ‘खुदा, मेहेरबानी ...’, मगर परिक्षा तो पास करना चाहती हो! तो, लो! इसकी सज़ा ये है, कि दो सौ हज़ार बार लिखो! कोई बात नहीं! कोई बात नहीं! भयभीत आंटी ने मानिच्का को सोने के लिए भेजा. ‘ऐसा नहीं करते. रटाई भी एक हद के भीतर होनी चाहिए. थकान से चूर हो जाओगी, तो कोई भी जवाब न दे पाओगी.

क्लास में वही पुराना दृश्य था, भयभीत फुसफुसाहट और परेशानी, और पहली विद्यार्थिनी का दिल, जो हर मिनट तीन घंटों के लिए रुक जाता था, और परिक्षा के टिकट, जो चार पैरों पर घूम रहे थे, और उदासीनता से उन्हें फेंटता हुआ टीचर. 

मानिच्का बैठी है और, अपनी किस्मत के फैसले का इंतज़ार करते हुए पुरानी नोटबुक के कवर पर लिखती है: 

‘खुदा मेहेरबानी कर. सिर्फ छः सौ बार लिख ले तो वह बढ़िया अंकों से पास हो जायेगी!’

“मैडम, कुक्सिना मारिया!”

नहीं, नहीं लिख पाई! टीचर गुस्से में है, व्यंग्य करता है,  सभी से  प्रश्न-टिकट के अनुसार नहीं, बल्कि कहीं से भी, कुछ भी पूछ लेता है.

“आन्ना इयोनव्ना के युद्धों के बारे में और उनके परिणामों के बारे में आप क्या जानती हैं, मैडम कुक्सिना?”

मानिच्का के थके हुए दिमाग़ में कोई चीज़ रेंग गयी: “आन्ना इयोनव्ना का जीवन भरा हुआ था...आन्ना इयोनव्ना भरी हुई थी...आन्ना इयोनव्ना के युद्ध भरे हुए थे....वह थोड़ा रुकी, गहरी सांस ली, और आगे बोली, मानो आखिरकार सही चीज़ कह रही हो: “आन्ना इयोनव्ना के परिणाम भरे हुए थे...और खामोश हो गई .

टीचर ने हथेली में अपनी दाढी लेकर नाक पर दबाई. मानिच्का पूरे मन से इस हरकत को देख रही थी, और उसकी आंखें कह रही थीं : ‘जानवरों को क्यों तंग करते हो?

“क्या आप अब बतायेंगी, मैडम कुक्सिना,” टीचर ने हौले से पूछा, “ओरलियन्स की कन्या को ‘ओर्लियान्साकाया’ क्यों कहते थे?

मानिच्का ने महसूस किया कि ये अंतिम प्रश्न है, जिसके परिणाम भयानक, सबसे ‘भयानक परिणाम’ होंगे. सही जवाब के साथ होंगे : साइकिल, जिसका वादा आंटी ने अगली कक्षा में जाने पर किया था, और लीजा बेकिना के साथ चिरंतन दोस्ती, जिससे, फ़ेल होने पर जुदा होना पडेगा. लीज़ा ने तो परिक्षा पास कर ली थी, और आराम से अगली कक्षा में चली जायेगी.

“तो?” शिक्षक जल्दी कर रहे थे, ज़ाहिर है, वह मानिच्का का जवाब सुनने के लिए उतावले हो रहे थे.

“उसे ओर्लियान्स्काया क्यों कहते थे?

मानिच्का ने मन ही मन वादा किया की फिर कभी मीठा नहीं खायेगी और असभ्यता से बर्ताव नहीं करेगी.  

उसने ‘आइकन’ की तरफ़ देखा, गला साफ़ किया, और शिक्षक की आंखों में सीधे देखते हुए दृढ़ता से जवाब दिया : “क्योंकि वह ‘लड़की’ थी.”   

 

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