Friday, 21 September 2018

लड़के - अंतोन चेखव



लड़के

लेखक : अंतोन चेखव
अनुवाद : आ. चारुमति रामदास


“ वोलोद्या आ गया!” आँगन में कोई चिल्लाया.

 “वोलोदिच्का आ गए!” डाईनिंग हॉल में भाग कर आते हुए नतालिया चीखने लगी, “आह, या ख़ुदा!”
कई घण्टों से अपने वोलोद्या का इंतज़ार कर रहा कोरोल्येव परिवार खिड़कियों की ओर लपका. प्रवेश-द्वार के पास चौड़ी नीची त्रोयका- स्लेज खड़ी थी, और तीनों सफ़ेद घोड़ों से घना कोहरा निकल रहा था. स्लेज खाली थी, क्योंकि वोलोद्या पोर्च में आ गया था और अपनी लाल, ठण्ड के मारे अकड़ी हुई उँगलियों से अपना लम्बे कानों वाला शिरस्त्राण निकाल रहा था. उसके स्कूली-ओवर कोट, कैप, कलोश (जूतों के ऊपर पहनने के रबड़ के जूते), और कनपटियों के बालों पर बर्फ़ की पतली तह जमी थी, और सिर से पैर तक उसके पूरे बदन से बर्फ की ऐसी प्यारी ख़ुशबू आ रही थी; उसकी ओर देखने भर से ठण्ड से जम जाने और ‘बुर्र-र् र्!’ कहने को जी चाहता था. मम्मा और आण्टी उसे अपनी बाँहों में भरने और चूमने के लिए लपकीं, नतालिया उसके पैरों पर गिर पड़ी और खींच कर उसके ऊनी जूते उतारने लगी, बहनें चीखने लगीं, दरवाज़े चरमराने लगे, भड़भड़ाने लगे, और वोलोद्या के पापा, सिर्फ जैकेट पहने और हाथों में कैंची लिए प्रवेश-कक्ष में भागते हुए आए और भयभीत होकर चिल्लाने लगे:

 “और हम तो कल से तुम्हारी राह देख रहे हैं! सफ़र तो अच्छा रहा? ख़ैरियत से? ऐ ख़ुदा, उसे पापा के गले तो मिलने दो! क्या मैं उसका बाप नहीं हूँ?”
 “भौ! भौ!” अपनी पूँछ दीवारों और फर्नीचर से टकराते हुए गहरी आवाज़ में विशाल काला कुत्ता, मीलॉर्ड, गरजा.

हर चीज़ एक प्रसन्नता भरी चीख में गड्ड-मड्ड हो गई, जो क़रीब दो मिनट तक जारी रही. जब ख़ुशी का पहला दौर गुज़र गया, तो कोरोल्येवों ने गौर किया कि वोलोद्या के अलावा प्रवेश-कक्ष में एक छोटा लड़का और भी है, जो मफ़लरों में, शॉलों में, और शिरस्त्राण में, और बर्फ की पतली सतह में लिपटा हुआ है; वह एक कोने में, लोमड़ी की खाल वाले बड़े ओवर कोट से पड़ती छाया में निश्चल खड़ा था.

 “वोलोदिच्का, और ये कौन है?” मम्मा ने फुसफुसाते हुए पूछा.
 “आह!” वोलोद्या को जैसे अचानक याद आया, “ये, आपसे परिचय कराने में गर्व का अनुभव कर रहा हूँ, मेरा कॉम्रेड चेचेवीत्सिन है, दूसरी क्लास में पढ़ता है...मैं उसे अपने साथ कुछ दिन रहने के लिए ले आया.”
 “बड़ी ख़ुशी हुई, स्वागत है आपका!” पापा ने प्रसन्नता से कहा. “ माफ़ कीजिए, मैं घर की ही ड्रेस में हूँ, बिना फ्रॉक-कोट के...आईये! नतालिया, चेरेपीत्सिन महाशय को कपड़े उतारने में मदद कर! या ख़ुदा, और इस कुत्ते को यहाँ से भगाओ! ये एक सज़ा है!”

कुछ देर बाद, इस शोर-शरावे वाले स्वागत से भौंचक्के, और अभी तक ठण्ड के कारण गुलाबी-गुलाबी, वोलोद्या और उसका दोस्त चेचेवीत्सिन मेज़ पर बैठकर चाय पी रहे थे. सर्दियों का सूरज, बर्फ से और खिड़कियों पर बने डिज़ाईनों से होते हुए समोवार पर थरथरा रहा था और अपनी साफ़-सुथरी किरणें हाथ धोने वाले प्याले में डुबो रहा था. कमरे में गर्माहट थी, और लड़कों को महसूस हो रहा था ठण्ड से जम चुके उनके शरीरों में, बिना एक दूसरे से हार माने, ठण्डक और गर्माहट गुदगुदी मचा रहे हैं.

 “तो, जल्दी ही क्रिसमस है!” काली-लाल तम्बाकू से सिगरेट बनाते हुए पापा ने मानो गाते हुए कहा, “और, क्या गर्मियाँ हुए बहुत दिन बीत गए, जब तुझे बिदा करते समय मम्मा रो रही थी? और देख, तू आ भी गया... समय, भाई, जल्दी बीत जाता है! ‘आह’ भी नहीं कर पाओगे, कि बुढ़ापा आ जाएगा,  चिबिसोव महाशय, खाईये, प्लीज़, शरमाईये नहीं! हमारे यहाँ सब कुछ सीधा-सादा है.”

वोलोद्या की तीनों बहनें, कात्या, सोन्या और माशा – सबसे बड़ी थी ग्यारह साल की – मेज़ पर बैठी थीं, और नये मेहमान से नज़र नहीं हटा रही थीं. चेचेवीत्सिन की उम्र और उसका क़द वोलोद्या जैसा ही था, मगर वो उतना सफ़ेद और भरा-भरा नहीं था, बल्कि साँवला और दुबला-पतला था, चेहरे पर लाल-लाल चकत्ते थे. उसके बाल ब्रश जैसे थे, आँखें छोटी-छोटी, होंठ मोटे-मोटे, संक्षेप में, वह बेहद बदसूरत था, और अगर उसने स्कूली-जैकेट न पहना होता तो शक्ल देखकर कोई भी उसे रसोईये का बेटा समझ लेता. वह बड़ा गंभीर था, पूरे समय चुप रहा, और एक भी बार नहीं मुस्कुराया. लड़कियाँ उसे देखकर यह सोचने लगीं कि शायद वो बहुत होशियार और वैज्ञानिक किस्म का व्यक्ति है. पूरे समय वह किसी चीज़ के बारे में सोच रहा था और अपने ख़यालों में इतना खो गया था कि जब उससे किसी बारे में पूछा जाता, तो वो थरथरा जाता, सिर को झटका देता और सवाल दुहराने की प्रार्थना करता.

लड़कियों ने इस बात पर भी गौर किया कि वोलोद्या भी, जो हमेशा ख़ुश रहता था और बातूनी था, इस बार बहुत कम बोल रहा था, ज़रा भी मुस्कुरा नहीं रहा था और जैसे कि उसे घर आकर ख़ुशी नहीं हो रही थी. जब तक वे चाय पीते रहे, वह अपनी बहनों से बस एक बार मुख़ातिब हुआ, और वो भी किन्हीं अजीब शब्दों के साथ. उसने समोवार की ओर ऊँगली से इशारा करते हुए कहा:
 “कैलिफोर्निया में चाय के बदले ‘जिन’ पीते हैं.”

वह भी किन्हीं ख़यालों में खोया हुआ था, और जिस तरह वह अपने दोस्त चेचेवीत्सिन पर कभी-कभी नज़र डाल लेता, उससे यह प्रकट हो रहा था कि दोनों लड़के एक ही बात के बारे में सोच रहे हैं.

चाय के बाद सब बच्चों के कमरे में गए. पापा और लड़कियाँ मेज़ पर बैठकर अपना काम करने लगे, जो लड़कों के आने से बीच ही में रुक गया था. वे क्रिसमस ट्री को सजाने के लिए रंगबिरंगे कागज़ से फूल और झालर बना रहे थे. ये बड़ा दिलचस्प और शोर-गुल वाला काम था. हर नए फूल का स्वागत लड़कियाँ उत्तेजना भरी किलकारियों से कर रही थीं, कभी-कभी तो ख़ौफ़नाक चीखें भी निकल रही थीं, मानो ये फूल आसमान से गिरा हो; पापा भी उत्तेजित थे, और कभी-कभी वे इस बात पर गुस्सा होकर कैंची मेज़ पर फेंक देते कि उसकी धार तेज़ नहीं है. मम्मा भाग कर बच्चों के कमरे में आई और उसने चिंतित स्वर में पूछा:
 “मेरी कैंची किसने ली है? इवान निकोलाईच, क्या तुमने फिर से मेरी कैंची ले ली?”     
 “माई गॉड! कैंची तक नहीं देते!” रोनी आवाज़ में इवान निकोलाईच ने जवाब दिया और, कुर्सी की पीठ से टिककर, एक अपमानित आदमी की तरह बैठ गए, मगर एक मिनट बाद फिर से चहकने लगे.

 इससे पहले जब भी वोलोद्या घर आता, तो वो भी क्रिसमस ट्री की तैयारियों में लग जाता या फिर भाग कर कम्पाऊण्ड में जाता, यह देखने के लिए कि गाड़ीवान ने और गडरिए ने कैसा बर्फ का पहाड़ बनाया है, मगर अब उसने और चेचेवीत्सिन ने रंगबिरंगे कागज़ की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और एक भी बार अस्तबल में नहीं गए, बल्कि खिड़की के पास बैठकर फुसफुसाहट से किसी बारे में बातें करते रहे; फिर  उन दोनों ने एटलस खोला और कोई नक्शा देखने लगे.

“पहले पेर्म,” हौले से चेचेवीत्सिन ने कहा... “उसके बाद त्यूमेन...फिर तोम्स्क...फिर...फिर...फिर कमचात्का...यहाँ से स्थानीय निवासी नौकाओं में बेरिंग-जलडमरूमध्य से ले जाते हैं...बस, आ जाता है अमेरिका...यहाँ काफ़ी सारे रोएँदार जानवर पाए जाते हैं.”
 “और कैलिफोर्निया?” वोलोद्या ने पूछा.
 “कैलिफोर्निया नीचे है...बस, हम अमेरिका पहुँच भर जाएँ, और कैलिफोर्निया बस, पहाड़ों के उस पार. खाने पीने का इंतज़ाम शिकार करके और लूट-पाट करके हो जाएगा.”

चेचेवीत्सिन पूरे दिन लड़कियों से दूर-दूर रहा और कनखियों से उनकी ओर देख लेता. शाम की चाय के बाद ऐसा हुआ कि उसे क़रीब पाँच मिनट लड़कियों के साथ अकेला छोड़ दिया गया. चुप रहना बड़ा अटपटा लगता. वह गंभीरता से खाँसा, दाहिनी हथेली बाएँ हाथ पर फेरी, उदासी से कात्या की ओर देखा और पूछा:
 “क्या आपने ‘माइन-रीड’ को पढ़ा है?”
 “नहीं, नहीं पढ़ा...सुनिए, क्या आपको स्केटिंग करना आता है?”

अपने ख़यालों में डूबे हुए चेचेवीत्सिन ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया, बस, कस के गाल फुला लिए और ऐसी साँस निकाली जैसे उसे बहुत गर्मी हो रही हो. उसने फिर से आँखें उठाकर कात्या की ओर देखा और कहा:
 “जब जंगली भैंसों का झुण्ड विशाल मैदानों से होकर भागता है, तो ज़मीन थरथराने लगती है, और उस समय जंगली घोड़े दुलत्ती झाड़ते हुए हिनहिनाने लगते हैं.”
चेचेवीत्सिन उदासी से मुस्कुराया और आगे बोला:
 “और रेड-इंडियन्स भी रेलगाड़ियों पर हमला कर देते हैं. मगर सबसे ख़तरनाक होते हैं मच्छर और दीमक.”
 “वो क्या होता है?”
 “ ये चींटियों जैसे होते हैं, बस, उनके पंख होते हैं. खूब तेज़ काटते हैं. मालूम है, मैं कौन हूँ?”
 “चेचेवीत्सिन महाशय.”
 “नहीं. मैं हूँ मोन्तिगोमो, बाज़ का पंजा, अपराजितों का सरदार. ”

माशा ने, जो सबसे छोटी थी, उसकी ओर देखा, फिर खिड़की की ओर देखा जिसके बाहर शाम उतर आई थी, और सोच में डूबकर कहा:
 “ और हमारे यहाँ कल चेचेवित्सा (चेचेवित्सा शब्द का मतलब है - मसूर की दाल) बनाई थी.”

चेचेवीत्सिन की ज़रा भी समझ में न आने वाली बातें, और यह भी कि वह लगातार वोलोद्या के साथ फुसफुसाता रहता था, और यह भी कि वोलोद्या खेल नहीं रहा था, बल्कि किसी चीज़ के बारे में सोचता रहता था – यह सब रहस्यमय, और अजीब था. और दोनों बड़ी लड़कियाँ, कात्या और सोन्या, लड़कों पर पैनी नज़र रखने लगीं. शाम को, जब लड़के सोने के लिए चले गए, तो वे दबे पाँव दरवाज़े तक आईं और छुप कर उनकी बातें सुनने लगीं. ओह, कैसी बातें पता चली उन्हें! लड़के, कहीं अमेरिका भागने की तैयारी कर रहे थे, सोना ढूँढ़ने के लिए; उनके सफ़र की पूरी तैयारी हो चुकी थी : पिस्तौल, दो चाकू, सूखे टोस्ट, आग जलाने के लिए मैग्निफायिंग ग्लास, कम्पास और चार रूबल्स.  उन्हें यह पता चला कि लड़कों को कई हज़ार मील पैदल चलना पड़ेगा, और रास्ते में शेरों से और जंगली इन्सानों से लड़ना पड़ेगा, फिर सोना और हाथी-दाँत खोजना पड़ेगा, दुश्मनों को ख़त्म करना पड़ेगा, समुद्री डाकुओं की टोली में शामिल होना पड़ेगा, ‘जिन’ पीनी पड़ेगी और अंत में सुन्दर लड़कियों से शादी करनी होगी और अपने बगान बनाने पड़ेंगे. वोलोद्या और चेचेवीत्सिन बातें कर रहे थे और जोश में आकर एक दूसरे की बात काट रहे थे. बातें करते हुए चेचेवीत्सिन अपने आप को - ‘मोन्तिगोमो, बाज़ का पंजा’ और वोलोद्या को - ‘मेरा बदरंग मुँह वाला भाई’ कह रहा था.
 “तू ध्यान रखना, मम्मा को इस बारे में मत बताना,” जब वे सोने जा रही थीं तो कात्या ने सोन्या से कहा. “वोलोद्या हमारे लिए अमेरिका से सोना और हाथी-दाँत लाएगा, और अगर तूने मम्मा को बता दिया, तो उसे जाने नहीं देंगे.”

क्रिसमस के दो दिन पहले चेचेवीत्सिन पूरे दिन एशिया का नक्शा देखता रहा और कुछ-कुछ लिखता रहा, और वोलोद्या, बेजान-सा, सूजा-सूजा सा चेहरा लिए, जैसे उसे मधुमक्खियों ने काटा हो, उदासी से कमरों में घूमता रहा, उसने कुछ भी नहीं खाया. और एक बार तो बच्चों के कमरे में वह देव-प्रतिमा के सामने रुका भी, और सलीब बनकर बोला:
 “ओ गॉड, मुझ पापी को माफ़ कर! गॉड, मेरी ग़रीब, दुखियारी मम्मा की हिफ़ाज़त कर!”

शाम तक वह रो पड़ा. सोने के लिए जाते समय, उसने बड़ी देर तक मम्मा, पापा और बहनों का आलिंगन किया. कात्या और सोन्या समझ रही थीं कि बात क्या है, मगर छोटी माशा को, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, बिल्कुल कुछ भी नहीं, बस सिर्फ चेचेवीत्सिन की ओर देखकर वह कुछ सोचने लगी और एक आह लेकर बोली:
 “जब उपवास होता है, तो आया-माँ कहती है कि चना और मसूर खाना चाहिए.”

क्रिसमस के एक दिन पहले, सुबह-सुबह कात्या और सोन्या हौले से अपने अपने पलंग से उठीं और ये देखने के लिए चल दीं कि लड़के अमेरिका कैसे भागते हैं. दरवाज़े के पास छिप गईं.
 “तू नहीं जाएगा?” चेचेवीत्सिन गुस्से से पूछ रहा था. “बोल : नहीं जाएगा?”
 “ओह माई गॉड!” वोलोद्या धीमे से रो रहा था. “मैं कैसे जाऊँगा? मुझे मम्मा पर दया आ रही है.”
 “ मेरे बदरंग मुँह वाले भाई, मैं तुझसे विनती करता हूँ, हम जाएँगे! तूने तो वादा किया था कि जाएगा, ख़ुद ही मुझे फुसलाया, और जब जाने का समय आया, तो डर गया.”
 “मैं...मैं नहीं डरा, मगर मुझे...मुझे मम्मा का ख़याल आता है.”
 “तू बोल, चलेगा या नहीं?”
 “मैं चलूँगा, बस...बस, थोड़ा रुक जा. मुझे घर में थोड़े दिन बिताने की ख़्वाहिश है.”
 “तो फिर, मैं अकेला ही जाऊँगा!” चेचेवीत्सिन ने फैसला कर लिया. “तेरे बगैर भी काम चला लूँगा. और शेरों का शिकार करने चला था, लड़ना चाहता था! जब ऐसी बात है, तो मेरी कैप्स दे दे!”
वोलोद्या इतनी ज़ोर से रो पड़ा, कि बहनें भी अपने आप को न रोक पाईं और धीमे-धीमे रोने लगीं. ख़ामोशी छा गई.
 “तो, तू नहीं जाएगा?” चेचेवीत्सिन ने फिर से पूछा.
 “जा...जाऊँगा.”
 “तो कपड़े पहन ले!”

और चेचेवीत्सिन ने वोलोद्या को मनाने के लिए अमेरिका की तारीफ़ शुरू कर दी, वह शेर की तरह गरजा, इंजिन की तस्वीर बनाई, गालियाँ दीं, वोलोद्या को सारे के सारे हाथी-दाँत और सिंहों और शेरों की सारी खालें देने का वादा किया.

और, ब्रश जैसे बालों वाला, चेहरे पर लाल धब्बों वाला, दुबला-पतला साँवला लड़का लड़कियों को असाधारण, लाजवाब प्रतीत हुआ. ये ‘हीरो’ था, निर्णय लेने वाला, निडर आदमी, और वह इस तरह गरज रहा था कि दरवाज़े के पीछे से भी ऐसा लग रहा था कि ये वाक़ई में शेर या सिंह ही है.

जब लड़कियाँ वापस अपने कमरे में आईं और कपड़े पहन कर तैयार हो गईं तो कात्या ने आँखों में आँसू भरकर कहा:
 “आह, मुझे कितना डर लग रहा है!”

दो बजे तक, जब वे खाना खाने बैठे, तो सब कुछ ठीक-ठाक था, मगर खाने की मेज़ पर अचानक पता चला कि लड़के घर में नहीं हैं. उन्हें बुलाने के लिए नौकर को सर्वेन्ट्स क्वार्टर में भेजा गया, अस्तबल में भेजा गया, कारिंदे के घर भेजा गया – वे कहीं भी नहीं थे. गाँव में भी नौकर को भेजा – वे वहाँ भी नहीं मिले. बाद में चाय भी लड़कों के बगैर ही पी गई, मगर जब रात का खाना खाने बैठे, तब मम्मा बहुत परेशान थी, वो रो भी रही थी. और रात को दुबारा गाँव में गए, ढूँढते रहे, लालटेन लेकर नदी पर भी गए. माई गॉड, कैसी आफ़त मची थी!

दूसरे दिन पुलिस अफ़सर आया, डाईनिंग हॉल में बैठकर कोई कागज़ लिखते रहे. मम्मा रो रही थी. मगर, तभी प्रवेश-द्वार के पास चौड़ी नीची त्रोयका- स्लेज खड़ी थी, और तीनों सफ़ेद घोड़ों से घना कोहरा निकल रहा था.

 “ वोलोद्या आ गया!” आँगन में कोई चिल्लाया.
 “वोलोदिच्का आ गए!” डाईनिंग हॉल में भाग कर आते हुए नतालिया चीखने लगी.

और मीलॉर्ड गहरी आवाज़ में भौंका :“भौ! भौ!” पता चला कि लड़कों को शहर में रोक लिया गया था, ढाबे  के कम्पाऊण्ड में (वे वहाँ घूम रहे थे और पूछते जा रहे थे कि बारूद कहाँ मिलती है). 

वोलोद्या, जैसे ही प्रवेश-कक्ष में आया, उसने बिसूरना शुरू कर दिया और मम्मा की गर्दन से लिपट गया. लड़कियाँ, डर से काँपते हुए सोच रही थीं कि अब आगे क्या होगा, उन्होंने सुना कि पप्पा वोलोद्या और चेचेवीत्सिन को अपने साथ स्टडी-रूम में ले गए और वहाँ काफ़ी देर तक उनसे बात करते रहे, और मम्मा भी बात कर रही थी और रो रही थी.
 “क्या कोई ऐसा करता है?” पप्पा ने पूछा. “ख़ुदा न करे, अगर स्कूल में पता चल गया तो, तो तुम्हें निकाल देंगे. और आपको शरम आनी चाहिए, चेचेवीत्सिन महाशय! बहुत बुरी बात है! आपने उकसाने का काम किया है, और, उम्मीद करता हूँ कि आपके माता-पिता आपको सज़ा देंगे. क्या कोई ऐसा करता है? रात में आप लोग कहाँ रुके थे?”    
 “रेल्वे स्टेशन पर!” चेचेवीत्सिन ने बड़ी अकड़ से जवाब दिया.

इसके बाद वोलोद्या सो गया, और उसके माथे पर सिरके में भीगा हुआ तौलिया रखा गया. कहीं टेलिग्राम भेजा गया और दूसरे दिन एक महिला, चेचेवीत्सिन की मम्मा आईं, और अपने बेटे को ले गईं.

जब चेचेवीत्सिन जा रहा था, तो उसका चेहरा बड़ा गंभीर, अहंकारयुक्त था, और लड़कियों से बिदा लेते हुए उसने एक भी शब्द नहीं कहा; सिर्फ कात्या के हाथ से नोटबुक ली और यादगार के तौर पर लिखा:
 ‘‘मोन्तिगोमो बाज़ का पंजा’

                                                                      ****

बूढ़ा रसोइया - कन्स्तान्तिन पाउस्तोव्स्की



बूढ़ा रसोइया

लेखक: कन्स्तान्तिन पाउस्तोव्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

सन् 1786 की सर्दियों की एक शाम को वियेना के बाहर लकड़ी के छोटे से घर में एक अंधा बूढ़ा – सरदारनी तून का भूतपूर्व रसोइया - मर रहा था. सच कहा जाए, तो वह घर नहीं, अपितु एक जीर्ण-शीर्ण कोठरी ही थी, जो बाग की गहराई में स्थित थी. बाग हवा से तोड़ी गई सड़ी-गली टहनियों से अटा पड़ा था. हर क़दम पर टहनियाँ चरमरा उठतीं और तब अपनी कोठरी में पड़ा कुत्ता गुरगुराने लगता. वह भी अपने मालिक की ही भाँति मर रहा था – बुढ़ापे के कारण, और भौंकने में असमर्थ था.
कुछ साल पहले भट्टियों की गर्मी के कारण रसोइया अन्धा हो गया था. सरदारनी के कारिंदे ने तभी से उसे कोठरी में टिका दिया था और समय-समय पर वह उसे कुछ चान्दी के सिक्के भी देता रहता.
रसोइए के साथ उसकी अठारह वर्ष की बेटी मारिया रहती थी. कोठरी में एक खाट, लंगड़ी बेंचें, भद्दी मेज़, दरारों वाले चीनी मिट्टी के बर्तन और मारिया की एकमात्र दौलत – तारों और पट्टियों वाला बाजा, क्लावेसिन – बस यही कुछ था.
क्लावेसिन इतना पुराना था कि उसके तार आस-पास होने वाली हर आवाज़ के जवाब में हौले-हौले बड़ी देर तक गाते रहते. रसोइया मुस्कुराते हुए क्लावेसिन को ‘अपने घर का पहरेदार’ कहा करता. घर में कोई भी क्लावेसिन की थरथराती, बूढ़ी झंकार के स्वागत से बचकर प्रवेश न कर पाता.
जब मारिया ने मरणासन्न पिता को नहलाकर उसे ठंडी, साफ़ कमीज़ पहनाई तो बूढ़ा बोला:
”पादरियों और संतों को मैंने कभी पसन्द नहीं किया. मैं पादरी के सामने अपने गुनाहों की क़बूली नहीं दे सकता, मगर मुझे मरने से पहले अपनी अंतरात्मा को शुद्ध करना होगा.”
 “क्या करना होगा?” घबरा कर मारिया ने पूछा.
  “सड़क पर जा,” बूढ़े ने कहा, “और जो भी पहला व्यक्ति मिले उसे मरते हुए व्यक्ति की स्वीकारोक्ति सुनने के लिए घर में बुला ला. तुझे कोई इनकार नहीं करेगा.”
 “हमारी सड़क इतनी सुनसान है...” मारिया बुदबुदाई और सिर पर रूमाल डालकर बाहर निकल गई.
वह दौड़ती हुई बाग से गुज़रकर ज़ंग लगे फ़ाटक तक पहुँची और बड़ी मुश्किल से उसे खोलकर वहीं ठहर गई. सड़क सुनसान थी. हवा उस पर पत्ते उड़ा उड़ाकर ला रही थी, और काले आकाश से बारिश की ठंडी बूंदें गिर रही थीं.
मारिया बड़ी देर तक इंतज़ार करती रही, आहट लेती रही. आख़िर उसे ऐसा महसूस हुआ कि चारदिवारी के निकट से गाता हुआ कोई व्यक्ति जा रहा है. वह कुछ क़दम आगे बढ़ी, उससे टकरा गई और चीख़ पड़ी.
आदमी रुक गया और उसने पूछा:
 “कौन है?”
मारिया ने उसका हाथ पकड़ लिया और थरथराती आवाज़ में पिता की इच्छा सुना दी.
 “ठीक है,” उस आदमी ने शांतिपूर्वक कहा. “मैं संत तो नहीं हूँ, मगर कोई बात नहीं. चलो, चलें!”
वे घर के अन्दर गए. मोमबत्ती के प्रकाश में मारिया ने छोटे क़द के कृश व्यक्ति को देखा. उसने बेंच पर गीला ओवरकोट फेंक दिया. वह सुरुचिपूर्ण और सादी पोषाक में था – मोमबत्ती की लौ उसकी काली जैकेट, क्रिस्टल की बटनों और झालरदार कॉलर में झिलमिला रही थी.
अजनबी काफ़ी जवान था. बच्चों जैसे अंदाज़ में उसने सिर को झटका दिया, फ़ौरन खाट के निकट स्टूल खिसका कर बैठ गया और झुककर एकटक और प्रसन्नतापूर्वक मरणासन्न व्यक्ति के चेहरे की ओर देखने लगा.
 “कहिए!” वह बोला. “शायद उस शक्ति के कारण जो मुझे ईश्वर से नहीं, अपितु उस कला की बदौलत प्राप्त हुई है, जिसकी मैं सेवा करता हूँ, मैं आपके अंतिम क्ष्णों को सुखकर बना सकूं और आपकी आत्मा का बोझ हटा सकूं.”
 “मैं जीवन भर काम करता रहा, जब तक कि अपनी आँखें न खो बैठा,” बूढ़े ने फुसफुसाकर कहते हुए हाथ से अजनबी को अपने निकट खींच लिया. “और, जो काम करता है, उसके पास गुनाह करने के लिए समय नहीं होता. जब मेरी पत्नी तपेदिक से बीमार हुई – उसका नाम मार्था था – और डॉक्टर ने ढेरों महंगी दवाइयाँ लिखकर दीं तथा उसे मक्खन, आलूबुखारे, गर्म लाल शराब देने को कहा तो मैंने सरदारनी तून के यहाँ से एक छोटी सी सोने की तश्तरी चुरा ली और उसके टुकड़े-टुकड़े करके उसे बेच दिया. अब उस बारे में याद करके और बेटी से उस कृत्य को छिपाते हुए मुझे अपनी आत्मा पर गहरा बोझ महसूस होता है : मैंने उसे पराई मेज़ की धूल को भी न छूने की शिक्षा दी है.”
 “क्या सरदारनी के किसी सेवक को इसके लिए दंडित किया गया?” अजनबी ने पूछा.
 “क़सम खाता हूँ, जनाब, किसी को भी नहीं,” बूढ़े ने जवाब दिया और वह फूट फूटकर रोने लगा. “यदि मैं जनता कि सोना मेरी मार्था को बचा न सकेगा, तो क्या मैं चोरी कर सकता था!”
 “आपका नाम क्या है?” अजनबी ने पूछा.
 “योगानी मेयर, जनाब.”
 “तो, योगानी मेयर,” अजनबी ने बूढ़े की दृष्टिहीन आँखों पर हथेली रखते हुए कहा, “लोगों की नज़रों में आप अपराधी नहीं हैं. जो कुछ आपने किया वह गुनाह नहीं है, चोरी भी नहीं, बल्कि प्रेम के वश होकर किया गया कार्य था.”
 “आमीन!” बूढ़ा फुसफुसाया.
 “आमीन!” अजनबी ने दुहराया. “और अब मुझे अपनी अंतिम इच्छा बताइए.
 “मैं चाहता हूँ कि कोई मारिया की देखभाल करे.”
 “मैं कर लूंगा. आप और क्या चाहते हैं?”
तब मरणासन्न व्यक्ति अप्रत्याशित रूप से मुस्कुराया और ज़ोर से बोला:
 “मैं एक बार फिर मार्था को वैसे ही देखना चाहता हूँ, जैसा कि मैंने उसे पहली बार देखा था. मैं सूरज देखना चाहता हूँ, और यह पुराना बाग भी जब वह बसंत में महक उठेगा. मगर यह नामुमकिन है, जनाब. इन बेवकूफ़ी भरी बातों के लिए मुझ पर क्रोधित न हों. बीमारी ने, शायद, मुझे पूरी तरह तोड़ दिया है.”
 “अच्छा,” अजनबी ने कहा और वह उठ गया. “ठीक है,” उसने दुहराया. वह क्लावेसिन के निकट गया और उसके सामने स्टूल पर बैठ गया. “अच्छा! ” उसने तीसरी बार ज़ोर से कहा, और अचानक एक झनझनाहट पूरी कोठरी में गूंज गई, मानो फ़र्शपर सैकड़ों काँच के मोती बिखर गए हों.
 “सुनिए,” अजनबी ने कहा. “सुनिए और देखिए!”
उसने क्लावेसिन बजाना आरंभ किया. जब पहला सुर उसके हाथों के नीचे से फूटा तो मारिया ने अजनबी के चेहरे की ओर देखा. एक अजीब से पीलेपन ने उसके माथे को ढँक लिया था और उसकी काली आँखों में मोमबत्ती की लौ नाच रही थी.
अनेक वर्षों बाद क्लावेसिन अपनी पूरी शक्ति से गा रहा था. अपने सुरों से उसने न केवल पूरी कोठरी को, बल्कि पूरे बाग को गुंजा दिया था. बूढ़ा कुत्ता अपनी कोठरी से निकलकर, सिर एक ओर को झुकाए बैठ गया और अपने कान खड़े करके ख़ामोशी से पूँछ हिलाने लगा. गीली बर्फ़ गिरनी शुरू हो गई थी, मगर कुत्ता उसे केवल अपने कान हिलाकर झटक देता.
 “मैं देख रहा हूँ, जनाब!” बूढ़ा बोला और वह अपनी खाट पर कुछ उठा. “मैं देख रहा हूँ वह दिन जब मैं मार्था से मिला था और उसने घबराहट में दूध से भरा बर्तन फ़ोड़ दिया था. यह हुआ था पहाड़ों पर, सर्दियों में. आसमान साफ़ था, मानो नीला पारदर्शी शीशा हो और मार्था मुस्कुरा रही थी. मुस्कुरा रही थी,” उसने तारों की झनझनाहट को सुनते हुए दुहराया.
अजनबी अंधेरी खिड़की से बाहर देखते हुए बजाता रहा.
 “और अब,” उसने पूछा, “आप कुछ देख रहे हैं?”
बूढ़ा, सुनते हुए, ख़ामोश रहा.
 “क्या आप नहीं देख रहे हैं,” संगीत जारी रखते हुए जल्दी से अजनबी ने पूछा, “कि रात काली से नीली हो गई है, और फिर आसमानी, और कहीं ऊपर से गर्माहट भरा प्रकाश आ रहा है और आपके पेड़ों की पुरानी टहनियों पर सफ़ेद फूल प्रस्फुटित हो रहे हैं. शायद ये सेब के फूल हैं, हालाँकि यहाँ से, इस कमरे से, वे घंटी जैसे त्युल्पान प्रतीत हो रहे हैं. आप देखिए : पहली किरण पथरीली चारदिवारी पर गिरी, उसे गरमा गई, उसमें से भाप उठ रही है. शायद शैवाल सूख रहा है, जो पिघलती हुई बर्फ से सराबोर है. और आसमान निरंतर ऊपर की ओर उठ रहा है, अधिकाधिक नीला होता जा रहा है, और पक्षियों के झुण्ड हमारे प्राचीन वियेना के ऊपर से उत्तर की ओर उड़ते जा रहे हैं.”
 “मैं देख रहा हूँ यह सब!” बूढ़ा चिल्लाया.
क्लावेसिन का पायदान हौले-हौले चरमरा रहा था, और वह दिल खोलकर. उत्साहपूर्वक बज रहा था, गाए जा रहा था, जैसे क्लावेसिन नहीं, बल्कि सैकड़ों किलकारियाँ भरती आवाज़ें आ रही हों.
 “नहीं, महाशय,” मारिया ने अजनबी से कहा, “ ये फूल ज़रा भी त्युल्पानों जैसे नहीं हैं. ये तो सेब के फूल प्रस्फुटित हो गए हैं एक ही रात में!”
 “हाँ,” अजनबी ने जवाब दिया, “ये सेब के ही फूल हैं मगर उनकी पंखुड़ियाँ काफ़ी बड़ी-बड़ी हैं.”
 “खिड़की खोलो, मारिया,” बूढ़े ने विनती की.
मारिया ने खिड़की खोल दी. ठंडी हवा का झोंका कमरे में घुस आया. अजनबी बड़े हौले-हौले, बहुत हल्के-हल्के बजा रहा था.
बूढ़ा तकिए पर गिर पड़ा, उसने जल्दी जल्दी, किसी लालची की भाँति गहरी गहरी अंतिम साँसें लीं और कंबल पर अपनी उंगलियाँ फेरने लगा. मारिया उसकी ओर लपकी. अजनबी ने अब बजाना बन्द कर दिया. वह क्लावेसिन के निकट बिना हिले-डुले बैठा रहा, मानो अपने ही संगीत के जादू से बुत बन गया हो.
मारिया चीख़ पड़ी. अजनबी उठा और खाट के निकट आया. बूढ़े ने गहरी साँस लेते हुए कहा:
 “मैंने सब कुछ इतना साफ़ देखा, जैसा कई सालों पहले देखा करता था. मगर मैं नाम – आपका नाम जाने बिना मरना नहीं चाहता!”
 “मुझे वोल्फ़ोंग अमादेइ मोज़ार्ट कहते हैं,” अजनबी ने उत्तर दिया.
मारिया खाट से दूर हट गई और नीचे, लगभग फ़र्श को छूते हुए घुटनों पर झुक गई महान संगीतकार के सामने.
जब वह सीधी ख्ड़ी हुई, तो बूढ़ा मर चुका था. खिड़कियों के बाहर ऊषा की लाली फूट रही थी और उसके प्रकाश में दिखाई दे रहा था बाग, गीली बर्फ़ के फूलों से आच्छादित!
---- ---





Thursday, 20 September 2018

फ्रीज़र - सिर्गेइ नोसव



फ्रीज़र
लेखक: सिर्गेइ नोसव 
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


आख़िरकार रात के दो बजे केक आ ही गया. दो टुकड़े खाने के बाद – एक अपने लिए और एक शौहर के लिए, - मार्गारीटा मकारोव्ना को टी.वी. की तलब आई, अपने प्यारे कॉमेडी-कलाकारों को देखने का जी चाहने लगा. वह हिम्मत करके डाइनिंग रूम से बाहर निकली और दूसरी मंज़िल पर भी चढ़ गई, जहाँ क्रिसमस ट्री की ख़ुशबू फैली थी, मगर टी.वी. तक वह पहुँच ही नहीं पाई – निढ़ाल होकर उससे सात कदम की दूरी पर आरामदेह कुर्सी में धंस गई, समझ गई, कि अब उसमें उठने की और टी.वी. चालू करने की शक्ति नहीं है, उसने गहरी सांस छोड़ी, पस्त हो गई और ऊँघने लगी.

जल्दी ही हॉल हल्की-हल्की आवाज़ों से भर गया. हेल्थ-रिसॉर्ट के दर्जनों रहने वाले यहाँ आ पहुँचे, जिससे कि एक दूसरे के मन में डर पैदा कर सकें, - उनका दिल ख़ौफ़नाक घटनाएँसुनना चाह रहा था, ये है नये साल का अटपटापन. मार्गारीटा मकारोव्ना सुन रही थी, मगर ग्रहण नहीं कर रही थी. सब लोग दबी ज़ुबान में बात कर रहे थे, जिससे मार्गारीटा मकारोव्ना जाग न जाए, मगर असल में, इस प्रोजेक्ट की तरफ़ दूसरे कोण से देखा जाए, तो...ख़ौफ़नाक कहानियाँ हमेशा इसी तरह से तो सुनाई जाती हैं.

वहाँ आए हुए लोगों में ज़्यादातर महिलाएँ ही थीं, - धीमी, रहस्यमय आवाज़ों में रक्तपिपासु सांप्रदायिकों के बारे में, सीरियल किलिंग्स के बारे में, इन्सानों को खाने वाले नकाबपोशों के बारे में बातें हो रही थीं. ऊँघ के बीच मार्गारीटा मकारोव्ना ने तीसरी मंज़िल के स्पोर्ट्स-वीकली के संवाददाता कोस्त्या सलव्योव की मौजूदगी को महसूस किया. छुट-पुट फिकरों की वजह से उसके अपने पति, मैमालोजिस्ट रस्तिस्लाव बरीसोविच ने भी अपनी उपस्थिति का एहसास करवाया. लगता है, कोई और मर्द नहीं थे.

नहीं, मार्गारीटा मकारोव्ना दहशतभरी बकवास को नहीं सुन रही थी, उसे तो खुमानियों के केक की याद आ रही थी, - वो सपना भी, जिसमें वह लुढ़क गई थी, मीठा, ख़ुशनुमा, खुमानी जैसा था.

(बस, प्लीज़, मुझसे ये न पूछिए, कि मार्गारीटा मकारोव्ना को कैसा सपना आ रहा है इसके बारे में मुझे कैसे मालूम है; मैं तो लेखक हूँ!...

बस, ऐसा ही था.)

इस बीच कोस्त्या सलव्योव ने, जहाँ तक टी.वी. के ऊपर रखी प्रकाश की एकमात्र स्त्रोत मोमबत्ती इजाज़त दे रही थी, महिलाओं के जामों में शैम्पेन डाल दी. बिजली, ज़ाहिर है, बंद कर दी गई थी.

“डियर लेडीज़,” बेख़याली से सलव्योव की उपस्थिति को अनदेखा करते हुए रस्तिस्लाव बरीसोविच ने इस समूह को संबोधित करते हुए कहा, “जो कुछ भी आप यहाँ कह रहे हैं, ख़तरनाक हद तक दिलचस्प है. मगर आप किसी और के साथ हुई घटना के बारे में बात कर रही हैं, न कि आपबीती सुना रही हैं. जब तक मेरी बीबी सो रही है, आपको एक अचरजभरी घटना के बारे में सुनाता हूं, जो ख़ुद मेरे साथ हुई थी. ग्यारन्टी के साथ कहता हूँ, कि आपकी पीठ और पैरों में ठण्डक दौड़ जाएगी.          
महिलाओं में काफी उत्सुकता दौड़ गई. रस्तिस्लाव बरीसोविच ने, शायद अनुमान लगा लिया, कि सोती हुई बीबी का ज़िक्र करने से उसकी बात का गलत मतलब लगाए जाने का ख़तरा है. उसने फ़ौरन स्पष्ट किया:

“नहीं, नहीं. मार्गो को ये किस्सा बहुत अच्छी तरह से मालूम है. और वैसे भी, मैं कई सारी बातों के लिए उसका शुक्रगुज़ार हूँ...आप अंदाज़ा नही लगा सकते कि उसने कैसे उस समय मेरा साथ दिया. उस घटना के बाद मुझे भयानक नर्वस-ब्रेकडाउन हो गया था. मगर उसने मुझे उससे बाहर निकाला, अपने पैरों पे खड़ा किया. ये लब्ज़ इस्तेमाल करने से मैं हिचकिचाऊँगा नहीं, उसने मुझे बचाया.

उसने प्राकृतिक यूरोपियन बालों से बना उसका विगठीक किया जो एक किनारे को खिसक गया था.

“सोने दें थोडी देर,” रस्तिस्लाव बरीसोविचने भावुकता से कहा. “कभी ये मेरे साथ क्लिनिक में नर्स का काम करती थी.”

“छोडो, छोडो,” उपस्थित लोगों ने रज़ामंदी दर्शाई. “आप सुनाइये, रस्तिस्लाव बरीसोविच, ये इतना दिलचस्प है.”   

रस्तिस्लाव बरीसोविच ने अपनी कहानी शुरू की:

“ये किस्सा मेरे साथ हुआ था, पेर्वोमायस्क  शहर में....”

तभी सलव्योव ने उसकी बात काटते हुए पूछा:

“कौन से वाले पेर्वोमायस्क  में? कहीं वही तो नहीं, जो आजकल स्तारोस्कुदेल्स्क कहलाता है?”

“देखिए, जानता है आदमी,” रस्तिस्लाव बरीसोविचने ख़ुशी से कहा. “स्तारोकुदेल्स्क – ये शहर का प्राचीन ऐतिहासिक नाम है. बस, प्लीज़, सिर्फ ये न कहिये, कि आप वहाँ जा चुके हैं.”

“जा चुका हूँ? हाँ, मैं वहां प्रादेशिक अखबार में मशक्कत करता था! पंद्रह साल पहले.”

“वाह!” रस्तिस्लाव बरीसोविच ज़ोर से चहका, बीबी बस जागते-जागते रह गई. “सुना आपने?! मैं भी...पंद्रह साल पहले...एक हादसे में फँस गया था!...”

“क्या हम मिल चुके हैं?” सलोव्येव ने आँखें सिकोड़ते हुए अपनी याददाश्त पर ज़ोर देते हुए पूछा.
“सवाल ही नहीं है. मैं पेर्वोमायस्क  में सिर्फ कुछ घंटे ही था. इकतीस दिसम्बर को, इत्तेफ़ाक से! और सिर्फ दो लोगों को छोड़कर मैं वहाँ किसी से भी नहीं मिला था. अच्छा बताइये तो सही, चूंकि आप अख़बार में काम करते थे, तो शायद आपको पता होगा, कि पेर्वोमायस्क  में लोग कहीं बिना कोई निशान छोड़े गायब तो नहीं हुआ करते थे?”

“उस समय तो पूरे रूस में लोग गायब हो जाया करते थे, ऐसे हालात थे,” सलोव्येवने उड़ते-उड़ते जवाब दिया.

“नहीं, बल्कि पेर्वोमायस्क  में, पेर्वोमायस्क  में?” रस्तिस्लाव बरीसोविचने फिर से कोशिश की. “कहीं वहाँ कोई सीरियल किलरया साफ़-साफ़ पूछूं तो, ‘सीरियल किलर्सतो नहीं थे?...”

सवाल से परेशान सलोव्येव बुदबुदाया :

“वैसे तो, मैंने वहाँ सिर्फ चार महीने ही काम किया था. नया साल आते-आते मैं मॉस्को आ गया था.”
“तब, ठीक है,” रस्तिस्लाव बरीसोविचने कहा, “आपको पता नहीं चला होगा...”

महिलाएँ, जिनकी उत्सुकता चरमसीमा तक पहुँच गई थी, एक सुर में मांग करने लगीं, कि फ़ौरन कहानी शुरू की जाए.

“तो, ये अजीब घटना मेरे साथ पेर्वोमायस्क  में हुई,” रस्तिस्लाव बरीसोविचने दुहराया, उसके बाद आराम से जाम की शैम्पेन ख़तम की और ग़ौर से बीबी की तरफ देखा: मार्गारीटा मकारोव्ना कुर्सी में पूरी तरह समाकर, सुकून से सो रही थी, 

और उसने कहानी आगे बढ़ाई.

और करीब बीस मिनट में पूरी कर दी.

इन बीस मिनटों के दौरान रस्तिस्लाव बरीसोविच हॉल का आकर्षण केंद्र बना रहा.

सुननेवालियाँ, जैसा कि बाद में उन्होंने स्वीकार किया, काफ़ी चकित थीं, और कई तो परेशान भी थीं, रस्तिस्लाव बरीसोविच के अजीब से, भरोसा दिलाते, करीब-करीब स्वीकारोक्ति जैसे अंदाज़ ने (कम से कम, सभी पर, एक साथ, गहरा असर डाला था) – वैसे भी “डरावना” किस्सा सुनाने वाले से किसी ने भी असली उत्तेजना की उम्मीद रखने की जुर्रत नहीं की. बाद में, जब इस सनसनीखेज़ किस्से को सेनिटोरियम की सभी मंज़िलों पर बार-बार सुनाया जाएगा, और पार्क के बर्फ साफ किये गए गलियारों में एक साथ या दो-दो के गुटों में टहलते हुए रस्तिस्लाव बरीसोविच की अजीब किस्मत पर चर्चा होगी, वे सभी, जिन्होंने इस किस्से को ख़ुद उसीके मुँह से सुना था, रस्तिस्लाव बरीसोविच के बयान करने के अंदाज़ को, उसकी ख़ासियत को याद करने का और उस पर गौर करने का एक भी मौका नहीं छोडेंगे: जोश, विश्वसनीयता, स्वीकारोक्ति. ये सही है, कि ऐसे शक्की लोग भी मिल जाएँगे (ख़ासकर, उनमें जिन्हें किस्से को घिसे पिटे तरीके से बार-बार दुहराए जाने के परिणामस्वरूप मोटे तौर पर इसका सारांश पता चला है) जो कहेंगे : वो, जिसे तुम जोश, विश्वसनीयता, स्वीकारोक्ति समझ रहे हो – शायद सिर्फ एक आम, भलीभांति आत्मसात् की गई ट्रिक है, जो महिलाओं की सभा में तुरंत सफलता के लिए अपनाई जाती है. मगर इस बात पर बहस कौन करेगा, कि रस्तिस्लाव बरीसोविच, किस्सा शुरू करते समय, अच्छी तरह समझ रहा था, कि वह किसके सामने और क्यों अपनी कहानी सुना रहा है; अगर उसने स्वयम् को इस छोटे से नाटक का रचयिता समझ लिया, तो फिर क्यों नहीं? – वह एक अच्छा एक्टर भी बन सकता था. ज़्यादा महत्वपूर्ण बात ये है, कि किस्सा सुनाते हुए, वो, सभी की राय में, ख़ुद ही कुछेक बातें समझना चाह रहा था, - ये सबको याद रहेगा. मतलब, रस्तिस्लाव बरीसोविच का किस्सा, एक स्थानीय लोक-कथा बन जायेगा और न केवल इस शिफ्ट के, बल्कि आने वाली शिफ्टों के – अप्रैल तक के, और शायद मई के भी टूरिस्ट्स के बीच चलता रहेगा. कोस्त्या सलव्योव, प्रादेशिक अख़बार में अपने मशक्कतके अनुभव को याद करके, इस किस्से को एक साहित्यिक रचना के रूप में प्रस्तुत कर देगा, मगर, अफ़सोस, उसके हाथ रचनात्मक असफ़लता ही आयेगी. पहली बात, वो, पेर्वोमायस्क  के जीवन से भली भांति परिचित होने के कारण, अपने लेखकीय स्वको बढ़ा-चढ़ा कर पेश करेगा, और दूसरी बात, परिणामस्वरूप – पेश करने के अंदाज़ में मात खा जायेगा. वाकई में, रस्तिस्लाव बरीसोविच के मौखिक स्वगत-कथन को लिखित रूप में प्रस्तुत करना बेहद मुश्किल है. साहित्यिक परिष्करण के बिना काम नहीं चलेगा. अगर काबिल व्यक्तियों में से कोई रस्तिस्लाव बरीसोविच के अत्यंत भावावेशपूर्ण स्वगत-कथन को उचित दिशा में हल्के से सुधार कर (जैसे, ‘प्यारी महिलाओं के प्रति अत्यधिक आग्रहों को घटा कर और भावनाओं के अतिरेक को कम करके), अपने शब्दों में सुनाने का निर्णय करे, तो वो कुछ इस तरह का हो सकता है.

इस तरह का.

तुलना के लिए माफ़ करें, मेरे दोस्तों, मगर मैं था कौन?... मैं था, परवाने जैसा, जो शमा की ओर लपकता है. परवाने जैसा!...

सोचिये, उसका नाम था फ़इना. इसके बाद मैं कभी भी किसी फ़इना से नहीं मिला.

शुरुआत कुछ पहले ही हुई थी...नये साल से करीब तीन महीने पहले.

मैं ये नहीं बताऊंगा कि हमारी मुलाकात किन परिस्थितियों में हुई, मगर क्यों नहीं? – ये हुआ था ग्लीन्स्का में, रेल्वे स्टेशन पर, मुझे मॉस्को जाना था, उसे, बाद में पता चला, पेर्वोमायस्क, मतलब, आज के स्तारोस्कुदेल्स्क. हम अलग-अलग टिकिट-खिडकियों के सामने खड़े थे, मेरा नंबर बस आ ही गया था, मगर उसे अभी काफ़ी देर तक कतार में खड़ा रहना था. वो कोई किताब पढ़ रही थी. उसने मुझे नहीं देखा था, हालाँकि अब मुझे शक है, कि पहले किसने किसको देखा था, आज मुझे इस बात का भी यकीन नहीं है, कि वो वाकई में ख़ूबसूरत थी, जैसा मुझे तब प्रतीत हुआ था. हो सकता है, कि मुझे पहले चुना गया था, भीड़ से अलग करके, - हो सकता है, कि मैं किसी मानसिक धोखे का शिकार बन गया था, जैसे जिप्सी लोग करते हैं. वैसे, उसमें कुछ जिप्सियों जैसी बात तो थी, और, सबसे पहले, बेशक, उसकी आँखें – काली, जैसे, पता नहीं क्या...जैसे बेपनाह गहरे दो छेद. मगर आँखें मैंने थोड़ी देर बाद देखीं – जब हम करीब आये. मतलब, मैं उसकी ओर एकटक देखने लगा, जो, स्वीकार करना पड़ेगा, कि अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं करता हूं – भीड में किसी औरत की ओर एकटक देखना, मगर मैं किसी पागल की तरह उसकी ओर आँखें गडाए था, और ऊपर से मैं कतार की दिशा के  विपरीत मुड गया, - देखा और इस बात से हैरान हो गया, कि दूसरे लोग उसकी तरफ़ क्यों नहीं देख रहे हैं? सही में, कोई भी नहीं देख रहा था. सिर्फ मैं अकेला ही देख रहा था. क्या इसका कोई ख़ास मतलब है?...तो, बात इसीके बारे में है.      

आगे का घटनाक्रम इस प्रकार है. वो किताब में देख रही है, और मैं उसे देख रहा हूं; अचानक वह पढ़ना रोक देती है, जैसे महसूस कर रही हो, कि लोग उसकी ओर देख रहे हैं, और अचूकता से, बिना किसी सहायता के मुझ पर नज़र गड़ा देती है. और, मैं क्या करता हूँ? मैं हाथ के इशारे से उसे बताता हूँ, कि यहाँ खड़ी हो सकती है, मेरे आगे, - प्लीज़, मैं आपको जाने दूँगा. और वो, मुझे ऐसा लगा, कि थोड़ा सा हिचकिचाकर, आँख़ों से मुझे धन्यवाद देते हुए हमारी कतार में आ जाती है और मेरे आगे खड़ी हो जाती है, और मैं, उसकी आँखों में झांकते हुए, यूँ ही किसी से कह देता हूँ हम एक साथ हैंऔर आँखें हटाकर देखता हूँ, कि वह किताब को पर्स में रख रही है, और वहाँ, पता है, कवर के ऊपर कोई विकृत व्यक्ति था और शीर्षक कुछ इस तरह का विध्वंसक आएगा सोमवार को’. 
पूछता हूँ: “दिलचस्प है?’ – “अरे नहीं, क्या कह रहे हैं,” वो जवाब देती है, “फालतू बकवास है!” – “तो फिर क्यों पढ़ रही हैं?” और पता है, उसने क्या जवाब दिया? उसने जवाब दिया : “मज़ेदार है.”

उसका पेर्वोमायस्क का टिकट बनाने में काफी देर लग रही थी, तब ग्लीन्स्का में रेल्वे काउन्टर्स पर कम्प्यूटर नहीं थे, मालूम नहीं है, कि अब हैं या नहीं; कैशियर लगातार कहीं फोन किये जा रही थी, खाली बर्थ्स के बारे में सूचना मांग रही थी, और मैं उसके पीछे खड़ा था...अरे, नहीं, कैशियर के नहीं, ख़ैर, बेवकूफ़ीभरे सवाल क्यों पूछ रहे हैं?...उसके पीछे खड़ा था और मुश्किल से अपने आप पर काबू कर रहा था, जिससे उसे अपनी बांहों में न भर लूँ, जिससे उसके गालों को होठों से न छू लूं.   

देखिये, आपके सामने मैं अपना दिल खोलकर रख रहा हूँ. वर्ना तो कहानी बनेगी ही नहीं.

तो ऐसी बात है. मैं उसके साथ प्लेटफॉर्म पर आया, हम स्टेशन के पास वाले छोटे से बगीचे में गए, वहां बीयर के स्टाल्स हैं, सिमेन्ट का घण्टे के आकार के फूल का फव्वारा है, मतलब - भूतपूर्व, मैपल्स के पेड हैं, वो मुझसे कहती है : “आप उदास क्यों हैं, उदास नहीं होना चाहिए”. मैं जोश से कहता हूं: “ ये आपसे किसने कह दिया, कि मैं उदास हूं?” वो कहती है : “साफ दिखाई दे रहा है”. और उस समय मैं कई असफ़लताओं से जूझ रहा था, मुझे पूरी दुनिया से नफ़रत हो गई थी, जीने की ख़्वाहिश ही नहीं रह गई थी. अपने मरीज़ों से नफ़रत हो गई थी, स्तनों की बीमारियाँ, मेरी प्रैक्टिस भी उन दिनों बेहद बुरी चल रही थी...”उदास न हों, देखिए, कितना अच्छा है”. और वाकई में बहुत अच्छा था: पतझड का मौसम, गिरते हुए पत्ते (अगर,बेशक, गंदे प्लेटफॉर्म से कल्पना की जाए तो). और तब मैं अचानक उसके सामने खुल गया, अपने बारे में बताने लगा. मुझ पर ये कैसा भूत सवार हो गया था? फिर मैं कल्पना की दुनिया में खो गया : सुख, भाग्य, मगर क्या-क्या कह डाला, याद नहीं – शायद लचर बातें थीं. मगर वो बड़े ग़ौर से मेरी बातें सुन रही थी, मैं भी इसीलिए कहे जा रहा था, क्योंकि मैं देख रहा था, कि वह कैसे मेरी बातें सुन रही है. पता नहीं, मुझमें ऐसी क्या ख़ासियत थी, मगर, एक आम बात को भी उसने अनदेखा नहीं किया, उस प्यारी लड़की ने. वो, प्यारी महिलाओं, आपको अच्छी तरह मालूम है: हमारे भाई को पटाना बेहद आसान है, अगर उससे उसकी विशेषता का ज़िक्र कर दो. हद से हद, जब ‌आह, प्यारे, और किसी के भी साथ इतना अच्छा नहीं लगा था, जितना तुम्हारे साथ”, पर हमारी छोटी-मोटी खूबियाँ भी, जब उनकी तारीफ़ की जाती है, तो बदले में प्यार जताने के लिए प्रेरित करती हैं. मैं पूरा का पूरा पिघल गया, जब उसे मेरे बयान करने का तरीका, कैसे कहूँ, ‘ख़ासप्रतीत हुआ. मतलब, उसे मुझमें कोई योग्यता नज़र आई, जैसे कुशाग्र बुद्धि, विरोधाभास. जैसे, इस तरह की बात कभी किसी से सुनी नहीं हो. जैसे कि मैंने उसके सामने मानव-स्वभाव को खोलकर रख दिया हो. इस बात के लिए धन्यवाद देते-देते रह गई, कि मैं दुनिया में हूँ. इस पर मैं कहता तो क्या कहता? कुछ नहीं. मगर मैंने उसके दिल को जैसे छू लिया था, ऐसा लगा. किसी तरह.

याद नहीं, कि कैसे हमने एक दूसरे के फोन नंबर लिये, और क्या ये हुआ था? – जैसे नहीं हुआ था, मगर मेरा पर्स जिसमें उसका पता और टेलिफोन नंबर था, मॉस्को में किसी ने पार कर लिया, मगर उसके पास मेरा नंबर, मतलब, रह गया.                           

हाँ, हमारी बातचीत करीब चालीस मिनट चली, चलो घंटे भर. उसकी ट्रेन आई, मैंने उसे कम्पार्टमेन्ट तक छोड़ा. बिदा लेते हुए उसने मुझे चूमा, जैसे किसी अपने को चूम रही हो. अगर बुलाती, तो मैं वैसे ही उसके पीछे-पीछे पेर्वोमायस्क चला जाता. ताज्जुब की बात है, कि नहीं गया, - मॉस्को में उस समय मेरे पास कोई ख़ास काम नहीं था.

शायद, मैं किसी और मुलाकात के लिए अपने आप को तैयार कर चुका था.

उसने मुझ पर सम्मोहन कर दिया था, मैं आपसे कहूँगा. मगर, प्यार मैं कर नहीं सकता था, नहीं कर सकता था. ये मेरा अंदाज़ नहीं है. मैं अपने आप को अच्छी तरह जानता हूँ.

इस बीच मेरे साथ ऐसा हुआ!

मॉस्को वापस लौटता हूं – जैसे पूरी तरह बदल गया हूँ – अपने आप में नहीं हूँ, दूसरा ही इन्सान बन गया हूँ. औरत के रूप में औरतों में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई – किसी भी औरत में नहीं, सिर्फ एक को छोड़कर, इस पेर्वोमायस्कवाली को छोड़कर. और ऊपर से, माफ़ कीजिए, ‘सेक्सकी इतनी चाहत पैदा हो गई, या अगन?...कि उसके बारे में कुछ न कहना ही बेहतर है, वर्ना अश्लील प्रतीत होगा. आप तो ख़ुद ही जानती हैं, कि डॉक्टर सनकी होते हैं, और मैं भी अपवाद नहीं हूँ, मगर यहाँ तो, जैसे कोई जुनून पैदा हो गया था!... ओह, अपनी कल्पना को मैं कैसे हवा दे रहा था! जैसे मैं कोई मुँहासे भरा स्कूली बच्चा हूँ, न कि पैंतीस साल का मेडिकल सायन्स का विशेषज्ञ! तो, मेहेरबानी करके मुझे बताइये, इसके बाद क्या मैं उसे शैतान नहीं समझूँगा?

जल्दी ही, सही में, ये सब रुक गया.

मगर कुछ ही वक्त के लिए.

दिसम्बर की बीस वाली तारीखों में टेलिफोन की घंटी बजती है. कानों पर भरोसा नहीं करता: फइना! अपने छोटे भाई के साथ नया साल मनाने के लिए पेर्वोमायस्क आने की दावत दे रही है. बस ऐसे ही दावत दे रही है. जैसे मैं बगल वाली सड़क पर रहता हूँ.

अब मैं आपसे पूछता हूँ: इस हरकत का क्या मतलब है? ज़ाहिर है, कि इसका मतलब सिर्फ निमंत्रण ही नहीं, बल्कि कुछ और भी है. मुझे अच्छी तरह याद है, कि कैसा आश्चर्य हुआ था – मानना पडेगा, बहुत अच्छा लगा था – मेरे ही फैसले पर, क्योंकि मैंने एक भी मिनट के लिए नहीं सोचा था, कि जाना चाहिए या नहीं. और वैसे, ऐसा लग रहा था, कि पहल मैंने की है, न कि उसने. उसने क्या कहा था? “हम,” बोली थी वो, “मेरे छोटे भाई के साथ मिलकर नया साल क्यों नहीं मना सकते?” समझ रहे हैं ना, ये सवाल था, सिर्फ एक सवाल. और मैं फ़ौरन बोला: “ओह,” कहता हूँ, “कितना ग़ज़ब का ख़याल है!” – “तो फिर, आ जाइये, आपसे मिलकर हमें ख़ुशी होगी.”

और मैं चल पड़ा. इकतीस दिसम्बर को. चल क्या पड़ा – चल नहीं पड़ा – लपका! और अगर उस समय कोई मुझसे कहता, कि मुझ पर किसीने जादू कर दिया है, तो मैं उस बेवकूफ़ के मुँह पर थूकता, इतनी स्वाभाविक मुझे प्रतीत हो रही थी  मेरी ललक.

नहीं, झूठ बोल रहा हूँ. जब पेर्वोमायस्क नज़दीक आ रहा था, मन में संदेह थे. सब कुछ इतनी आसानी से हो गया था. हो सकता है, कि मैंने बाद में ऐसी कल्पना की, मगर, मेरे ख़याल से, नहीं, - एक उत्तेजित करने वाला ख़याल था – चिढ़ाता सा, अपने आप को चिढ़ाता हुआ: जैसे, अभी प्लेटफॉर्म पे उतरोगे, और काली आँखों वाली सुंदरी के बदले खड़ी मिलेगी पोपले मुँह, लम्बी नाक वाली बुढ़िया: “क्या, प्यारे, पहुँच गए?”

और पता है, अगर उस समय वाकई में मेरे दिमाग़ में ये बकवास ख़याल आ सकता था, तो अपने गुज़रे हुए अनुभव को देखते हुए, स्वीकार करना पड़ेगा, कि वो बेवजह नहीं आया था...मगर, चलिए, सब कुछ सिलसिलेवार बताता हूं!

मेरा स्वागत किया गया था. मैं प्लेटफॉर्म पर उतरा और मैंने उसे देखा, और वो मुझे और भी ज़्यादा आकर्षक लगी, उससे भी ज़्यादा, जितनी ग्लीन्स्का में लगी थी. उसने बड़ी बड़ी बटनों की दो कतारों वाली, लम्बी काली ड्रेस पहनी थी, सिर पर कुछ नहीं था, और वो घिनौनी चीज़, जो आसमान से गिर रही थी, और जो बिल्कुल बर्फ जैसी नहीं थी, बड़े आश्चर्यजनक तरीके से उसके घने काले बालों में आकर्षक, चमकदार, पन्ने जैसी ओस की बूंदों में बदल रही थी. और सर्दियाँ बिल्कुल सर्दियों जैसी नहीं थीं, कुछ बेहूदा सी चीज़ थी. नया साल और बाहर का तापमान +4 डिग्री!

“मिलो, ये है मेरा भाई , गोशा”. – मतलब, वह मेरे साथ तुमपर उतर आई थी, बिना किसी हिचकिचाहट के. मैंने भी सोचा : बढ़िया है!

महाप्रलय पूर्व की पहले मॉडेल की वोल्गासे, जो तब भी प्राचीन एवम् दुर्लभ वस्तुओं में शुमार किये जाने लायक थी, मैं शाम के पेर्वोमायस्क का नज़ारा देख रहा था. करीब छह बज रहे थे, अंधेरा हो गया था. गोशा कार चला रहा था. उसे फिसलन भरे कीचड़ से होकर गाड़ी चलाना पड़ रहा था, बर्फ लगातार पिघल रही थी और बह रही थी. वह मज़ेदार तरीके से कार से बातें कर रहा था, कभी उसे नाम से संबोधित करता, प्यार से – ब्रोन्का, ब्रोनेच्का, ब्रोन्याशा. “ब्रोनेविक” (बख्तरबन्द गाडी) इस शब्द से,” - फइना ने कहा.

उनके साथ मुझे हल्का लग रहा था.

वे मुझे शहर के अंतिम छोर तक ले गए. वे लकड़ी के दुमंज़िले मकान में रहते थे, जो उन्हें माता-पिता से मिला था. उसमें अनगिनत कमरे थे, छह से कम तो थे ही नहीं. फइना मुझे घर दिखाने ले गई. ये है स्वर्गीय माता-पिता का कमरा, वहाँ जाने की ज़रूरत नहीं है, ये है गोशा का कमरा, ये रहा गोशा का फोटोस्टूडिओ, बहुत बडे फोटो-एनलार्जर के साथ, जो पुरानी एक्सरे मशीन की याद दिलाता था...ग़ौर कीजिए, मैं गोशा की फोटोग्राफी के नमूने देख ही नहीं पाया (कल्पना कर सकता हूँ कि वहाँ कैसे-कैसे फोटोग्राफ्स होंगे!).

नहीं, कुल मिलाकर गोशा मुझे तब अच्छा लगा था, मगर अब मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ, कि वो किसी सनकी जैसा था, बहन से भी ज़्यादा. पहली बात, मेरे बारे में अपनी राय का वह ज़रा ज़्यादा ही खुलकर प्रदर्शन कर रहा था. दूसरी, उसका बर्ताव भी काफ़ी भेद भरा लग रहा था, जैसे उसे कुछ मालूम है, जिसे वो छुपा रहा है. तीसरी बात, वह बहुत भेंगा था, हालाँकि इससे उसे कार चलाने में ज़रा भी मुश्किल नहीं हो रही थी, मगर जिसके कारण मैं उससे बात नहीं कर पा रहा था, - मैं समझ नहीं पा रहा था, कि उससे बात करते समय मुझे किस आँख की तरफ़ देखना है; अंदाज़ से उस वाली की तरफ़ जो तुम्हें देख रही है, मगर दोनों ही कहीं और ही देख रही थीं.                
सच कहूँ, तो मैंने गोशा से बहुत बातें नहीं कीं; वह मुझे फइना के साथ अकेले छोड़ने की कोशिश कर रहा था. उस समय मुझे महसूस हो रहा था, कि मेरी फइना के साथ आश्चर्यजनक रूप से अच्छी जम रही थी, दोनों तरफ़ किसी किस्म का दबाव नहीं था. जैसे इससे पहले हमने एक दूसरे के साथ सिर्फ एक घंटा नहीं, बल्कि आधी ज़िंदगी बिताई हो. बेशक, बिना हिप्नोसिस के ये हो नहीं सकता था. हालाँकि मैं मैमालोजिस्टहूँ, पर मनोविज्ञान की भी मुझे थोड़ी बहुत समझ है. इस घटना के बारे में मेरा एक अपना सिद्धांत भी है, मगर उसे यहाँ नहीं बताऊँगा. मुझे उनके घर में अटपटापन महसूस नहीं हो रहा था. और वो भी मेरे आने से अचकचा नहीं रही थी. जैसे लंबी जुदाई के बाद पति पत्नी के पास आया हो. ऊपर से, काफ़ी इंतज़ार के बाद. इस घर में जैसे मैं अपनापन महसूस कर रहा था, चाहे घर की हर चीज़ पहली बार ही क्यों न देखी हो.

जब वो मुझे मेरे वाले कमरे में ले जा रही थी, तब गोशा किचन में बर्तनों की खड़खड़ाहट कर रहा था. हर चीज़ मेरे लिए सजाई गई थी, सब कुछ साफ़-सुथरा था. थोड़ी शरम आई थी मुझे, याद है, लाल कम्बल देखकर: क्या लाल रंग का कोई ख़ास मतलब था? – मगर, मानता हूँ, कि उस समय तो मुझे पलंग की चौड़ाई ने आकर्षित किया था, क्योंकि चौड़ाई के इस आयाम से मेज़बान के इरादों का अप्रत्यक्ष रूप से आभास हो रहा था. और पलंग – सिंगल बेड नहीं था...मुझे लगा, कि फइना मेरे ख़याल पढ़ रही है, तभी मैंने फ़ौरन – उसकी ओर देखा! – और मुझे लगा: जैसे होठों पर पतंगे की परछाईं है... वह कुछ कहते-कहते रह गई. और उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे कॉरीडोर में ले आई. और मेरे कान में फुसफुसाई: “पता है, मैं बहुत ख़ुश हूँ, कि तुम आए हो”. वह कॉरीडोर में जा रही थी, और मैं उसके पीछे था, और तब मैंने फ़ौरन वो कर डाला, जो तब, रेल्वेस्टेशन की टिकिट खिडकी के पास नहीं कर पाया था: मैंने उसे रोक कर अपनी बाहों में ले लिया. ऐसे, पेट पकड़कर. उसने हौले से, बिना मुड़े, अपने आप को मेरे आलिंगन से ये कहते हुए आज़ाद किया: “मेज़ पर जाना चाहिए”, मतलब ये कहना था, “डाइनिंग टेबल सजाना है”, - और आगे चल पडी, अबूझे, शैतानी आकर्षण क्षेत्र से मुझे अपने पीछे-पीछे घसीटते हुए.

हम तीनों ने मिलकर मेज़ सजा दी, मैं, सच कहूँ, तो बस इधर-उधर डोलता रहा, क्योंकि फ्रीज से ओलिविएर सलाद और ड्रेस्ड हैरिंग निकालने में तो कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी. उन्होंने काफ़ी सारी चीज़ें बनाई थीं. वो साल, अगर आपको याद हो, हमारे देश के लिए भरपेट अनाज वाला नहीं था. मगर नए साल की मेज़ – एक पवित्र बात है. ये सभी के यहाँ होता है. मैं भी साथ में कुछ लाया था, - याद है, कैवियर का डिब्बा, वोद्का, शैम्पेन. क्रिसमस-ट्री के नीचे चुपके से दो डिब्बे रख दिए – उनके लिए गिफ़्ट्स. मगर गोशा ने देख लिया: “देखो तो, सान्ता क्लॉज़ आया था, साथ में कुछ तो लाया था”. इस पर वो सवालिया जवाब देती है: “और सान्ता क्लॉज़ वाला हमारा सरप्राइज़ क्या है? शायद, अभी? या बाद में?” – “चल, अभी”, - गोशा कहता है.

वो मुझे कमरे से कहीं भी न जाने के लिए कहते हैं और सरप्राइज़ के लिए निकल जाते हैं. मुझे, छुपाऊँगा नहीं, अच्छा लग रहा था. मैं इंतज़ार करता हूँ, उनके आपसी संबंधों पर ख़ुश होता हूँ.

अच्छे संबंध हैं. बहुत ही प्यार से, मिलजुलकर रहते हैं. आधे शब्द से ही एक दूसरे को समझ लेते हैं. वैसे, सच में, अजीब तरह से बातें करते हैं – एक दूसरे की ओर करीब-करीब देखे बिना, कम से कम, मेरी मौजूदगी में, - ये, जैसे गलती ढूँढ़ने पर ही उतर आओ तो...तब मैंने इस बात को कोई महत्व नहीं दिया था, मगर अब सोचता हूँ: ऐसा कहीं इसलिए तो नहीं था, कि वो अपनी आपसी समझ को मुझसे पूरी तरह छुपाना चाहते थे, वर्ना, संभव है कि मैं षडयंत्र को ताड जाऊँगा?

मगर उस समय मेरे मन में ये ख़याल भी नहीं था. मैं सुखी था, जितना दुनिया में कोई और नहीं हो सकता. और मुझे ऐसा लग रहा था, कि मेरे साथ कोई अत्यंत महत्वपूर्ण और आवश्यक घटना हो रही है, जैसे मैं ख़ुद कोई दूसरा इन्सान बन जाऊँगा, कि मैं फिर कभी भी, कभी भी पहले की तरह जी नहीं पाऊँगा. एक ख़ामोश खुशी ने मेरे अस्तित्व को सराबोर कर दिया था. और इन क्षणों में पूरी दुनिया मुझे साफ़-सुथरी, सुंदर नज़र आ रही थी, - जैसे किसी नर्म ब्रश से उसकी धूल झटक दी गई हो.

हालांकि विचित्रता के हल्के से एहसास ने, मानना पड़ेगा, मुझे छोड़ा नहीं था. बेशक. सब कुछ बड़ी आसानी से, हौले से हो गया था, मेरी ज़रा सी भी कोशिश के बगैर.

सुन रहा हूँ: ऊपर चल रहे हैं, कोई चीज़ सरका रहे हैं, ‘सरप्राइज़ निकाल रहे हैं.

तभी मुझे याद आया कि मैंने वोद्का फ्रीज़र में नहीं रखी थी.

बोतल लेता हूँ, फ्रिज के पास जाता हूँ, फ्रिज का दरवाज़ा खोलता हूँ...(मैंने शाम को फ्रिज में कई बार झांका था, मगर फ्रीज़र एक भी बार नहीं खोला था)...मतलब, मैंने फ्रीज़र खोला.

तो.

और, करीब पूरे पंद्रह साल हो गए, जब मैंने फ्रीज़र खोला था. अगर बिल्कुल सही-सही कहूँ तो पंद्रह साल और चार घंटे, दस मिनट कम-ज़्यादा.

तबसे कितना पानी बह गया है, कितनी सारी घटनाएँ हो चुकी हैं!...जैसे, मैंने शादी कर ली...हाँ...मार्गारीटा मकारोव्ना से...

नर्व्हस ब्रेकडाउन...अगर वो नहीं होती...

अच्छा. माफ़ कीजिए...मैं कुछ अंदाज़ तो लगा सकता हूँ, कि फ्रीज़र के बारे में आप क्या सोच रहे होंगे, और किसी हद तक वो सही भी होगा, मगर सिर्फ कुछ हद तक. मैं कोई भी शर्त लगाने के लिए तैयार हूँ, कि आप कल्पना भी नहीं कर पाएँगे कि फ्रीज़र में क्या था.

तो! उसमें थे दो जूते! दो बिल्कुल नये, काले जूते! बर्फ से ढँके हुए!

क्या माजरा है?

मैंने बोतल रखे बिना फ्रीज़र बंद कर दिया, कुर्सी पर बैठ गया और सोचने लगा. दिमाग पूरा सुन्न हो गया था! एक भी विचार नहीं. एक भी कैफ़ियत नहीं!

सैद्धांतिक रूप से ये माना जा सकता था, कि एक जूता फ्रीज़र में रखा जा सकता था किसी बेहद भुलक्कडपन के कारण...मगर सिर्फ एक!...मगर यहाँ तो दोनों हैं!

हो सकता है, मज़ाक हो? तो इसमें हँसने वाली बात क्या है?

मेरा सिर फटने को हो रहा था. मुझे लग रहा था, कि पागल हो जाऊँगा. मैंने सोच लिया कि ये मेरा भ्रम था. अपने आप पर यकीन नहीं हो रहा था.

तब मैंने फिर से फ्रीज़र खोला...जूते! मैंने गौर से देखा और मुझे जूतों से मुश्किल से झाँकती जुराबें नज़र आईं. मैंने एक जूता उठाया और मुझे महसूस हुआ कि वो खाली नहीं है, उसमें कुछ है!... मैंने उसे फ्रीज़र से बाहर निकाला, मैंने जूते के भीतर झांक कर देखा और मैंने बर्फीली चिकनी सतह देखी, किनारे तक आती हुई...समझ रहे हैं?...कोई कटी हुई चीज़, बर्फ बन चुकी कटी हुई चीज़!...एक अमानवीय भय ने मुझे दबोच लिया, मेरे होश बस खो ही गए थे!...

और मुझे पल भर में ही कुछ और भी याद आ गया – उसकी किताब किसी हत्यारे के बारे में, और खून जैसा लाल कंबल, और दो हाथों वाली आरी, जिसे संयोगवश प्रवेश द्वार के पास देखा था...और उनकी बातें भी याद आईं: “क्रिसमस-ट्री तिरछी खड़ी है”. – क्योंकि उसे तिरछा काटा गया है”. – “किसका कुसूर है?” – “मिलकर ही तो काटा था!” – “तू बड़ा आरी चलाने में माहिर है”. – “और तू?”
और भी बहुत कुछ याद आया.

और उनके कदम नज़दीक आ रहे थे. वे दरवाज़े के पास खड़े थे – अपना मनहूस सरप्राइज़ लिए! मैं सुन रहा था, कि वे कैसे फुसफुसा रहे हैं, जैसे दरवाज़े के पीछे किसी बात पर चर्चा कर रहे हों...

और फिर, जैसे मेरी आँखों से परदा हट गया!

जैसे मुझसे किसी ने कहा: “अपने आप को बचा, बेवकूफ़!”

और मैं खिड़की की ओर लपका - वो बंद थी! और पूरी ताकत से अपने आपको चौखट पे दे मारा, दोहरी चौखट पे, और दोनों चौखट साथ लिए उड चला, बाग में!...कैसे छिटका था, दिमाग़ समझ नहीं पाया!...

फेन्सिंग फांदी, और पूरे पेर्वोमायस्क के नये साल के उस चिपचिपे कीचड़ से होकर भागा रेल्वे स्टेशन की ओर! ये तो अच्छा था, कि पैसे पतलून की जेब में थे, और जैकेट भी था, मगर वो वहीं रह गया!

मेरी किस्मत अच्छी थी: पौने बारा बजे एक ट्रेन वहाँ से गुज़रने वाली थी. मुझे पहले कम्पार्टमेन्ट की टिकट दी गई, और वहाँ कण्डक्टर्स नया साल मना रहे हैं. कोई और नहीं था, मैं अकेला ही पैसेन्जर था! पूरी ट्रेन में – मैं इकलौता पैसेन्जर!...उन्होंने मेरे लिए गिलास में वोद्का डाली, ठण्डी. मेरे हाथ काँप रहे थे. मैंने आपबीती सुनाई. कण्डक्टर्स को बहुत अचरज हो रहा था, बोले, कि मैं किस्मतवाला हूँ. ऐसा था किस्सा.”

तो ऐसा किस्सा – शायद, कुछ अलग लब्ज़ों में – अपने बारे में सुनाया रस्तिस्लाव बरीसोविच ने.

रस्तिस्लाव बरीसोविच की कहानी से स्तब्ध होकर सभी श्रोता एक मिनट चुप रहे. मोमबत्ती की लौ किसी चुम्बक के समान नज़रों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी. कुछ देर इंतज़ार किया, कि कहीं रस्तिस्लाव बरीसोविच कुछ और तो नहीं जोड़ने वाला है. उसने आगे कुछ नहीं कहा. बस, ख़ामोशी... सोई हुई मार्गारीटा मकारोव्ना की नाक सूँ-सूँ कर रही थी.

ख़ामोशी को तोड़ा दूसरी बिल्डिंग की एलेना ग्रिगोरेव्ना ने, जो फर्स्ट रैंक की टैक्स इन्स्पेक्टर थी. उसने सावधानीपूर्वक कहा, कि रस्तिस्लाव बरीसोविच ने चालाकी से लोगों को हैरान कर दिया था, आसान शब्दों में – वह लोगों की भावनाओं से खेल रहा था – उसकी कहानी एकदम अविश्वसनीय है.                                                       

विरोध के सुर सुनाई दिए. ये घोषित किया गया, कि रस्तिस्लाव बरीसोविच की कहानी में कई सारे ऐसे विवरण थे, जो कपोल कल्पित नहीं थी. जैसे, वो ही जूते फ्रीज़र में...अगर उसे फ्रीज़र में जूते नहीं, बल्कि कोई और पारंपरिक चीज़ दिखाई देती, तो तब कहानी की विश्वसनीयता पर संदेह किया जा सकता था...मगर जूते! जूते क्यों? किसलिए? ऐसी चीज़ की कल्पना नहीं की जा सकती.

रस्तिस्लाव बरीसोविच से जूतों का रहस्य जानने की कोशिश की गई, मगर उसने अपनी कहानी की व्याख्या करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उसके पास इस संबंध में कोई ढंग का स्पष्टीकरण था ही नहीं.

और वो सरप्राइज़’…क्या सरप्राइज़ था? किसलिए?

“यहाँ काफी कुछ ऐसा है, जो तर्कहीन है,” रस्तिस्लाव बरीसोविच ने कहा. “मैं अक्सर दिमाग़ से सोचता हूँ, मगर यहाँ कुछ न सोचना ही बेहतर है.”

पूछने लगे: उसने पुलिस में रिपोर्ट दी थी या नहीं?

“नहीं. पता नहीं क्यों, मगर कोई चीज़ मुझे ऐसा करने से रोक रही थी.

लोग उसका धिक्कार करने लगे. गुस्सा भी करने लगे.

और तब सलव्योव उठा, जो अब तक चुप बैठा था. वो हॉल के बीचोंबीच आया. मोमबत्ती उसकी पीठ के पीछे जल रही थी, उसका चेहरा छाया में था, मगर उसके लगभग अदृश्य चेहरे से भी साफ़ ज़ाहिर हो रहा था, कि सलव्योव बेहद परेशान है.

“रस्तिस्लाव बरीसोविच, आपने बिल्कुल सही किया, कि कहीं भी रिपोर्ट नहीं की!”

एकत्रित समूह अविश्वास से चीख़ा. शोर होने लगा.

“आप सबसे ज़्यादा मैं चौंक गया हूँ!...” स्पोर्ट्स-जर्नलिस्ट सलव्योव सबको एक साथ संबोधित करते हुए चहका, उसने कहा, “अविश्वसनीय संयोग!...एक शानदार सिलसिला!...पता है, इस सबमें कुसूरवार कौन है?...मैं!...मैं अकेला और सिर्फ मैं!...चाहे तो मेरे टुकडे कर दो!...आप मेरी तरफ इस तरह क्यों देख रहे हैं?...अब, जैसे आपके हाथों से मछली की गंध आ रही है, मिसाल के तौर पे!...क्या करेंगे?...नींबू निचोड़ देंगे!...और जब प्याज़ काटते हैं, तो आप कुछ भी चबा रहे नहीं होते?...बस, इसीलिए रोते हैं!...कुछ चबाना चाहिए!...पेचकश के बिना बोतल?...आँ?...ये सब मेरा ही किया धरा है!...सब मेरा!...कैसे खोलें!...मैं यही सब करता था!...”

सभी स्तब्ध होकर सलव्योव की ओर देख रहे थे – कोई भय से, कोई ख़ौफ़ से : ये, वाकई में, बहुत अजीब है, जब इन्सान आपकी नज़रों के सामने पागल हो जाता है. मगर तभी सलव्योव फिर से रस्तिस्लाव बरीसोविच से मुख़ातिब हुआ:

“वो, जिसे आप जुराबें समझ रहे थे, जो जूतों से बाहर झांक रहे थे, असल में पॉलिथीन की थैलियाँ थीं, यकीन कीजिए, ये सचमुच में ऐसा ही था!...समझाता हूँ!...सब लोग सुनिए!...जब मैं अख़बार में काम करता था, मैं उसमें एक कॉलम लिखता था :घर के लिए उपयोगी सलाह”!...सारे अख़बारों में ऐसे कॉलम होते थे!...याद है?...ख़ैर, मैं आपको समझाता हूँ...कुर्सियाँ...कुर्सियों से फर्श पर खरोंचें पड़ती हैं!...क्या किया जाए? उनकी टांगों में वाइन की बोतलों के प्लैस्टिक के ढक्कन पहना दीजिए!...या फिर: आपको जूते पॉलिश करने हैं...बढ़िया! पुराने स्टॉकिंग्ज़ इस्तेमाल कीजिए और कोई समस्या ही नहीं!...और अगर जूते?...अगर जूते तंग हों तो?...क्या करें जब जूते तंग हों तो?...तो ऐसे मतलब, मुझे याद आया, कि जब मैं स्कूल में था, तभी हमारे फ्लोर वाले पडोसी ने मुझे सिखाया था, कि जूतों को चौड़ा कैसे करना चाहिए...और मैंने अख़बार में छाप दिया!...बेहद आसान है: जूतों में पॉलिथीन की थैली रखना चाहिए, उसे पानी से भरकर जूतों को अपने फ्रिज के फ्रीज़र में रख देना चाहिए!...पानी जमते हुए आयतन में फैलता है...”

“ये असंभव है!” रस्तिस्लाव बरीसोविच ज़ोर से बोला और झटके से उठ गया.

“आपको यकीन दिलाता हूँ, ये भौतिक शास्त्र का नियम है!...बर्फ फैलती है, जूता चौड़ा हो जाता है!... इकतालीस नंबर का जूता था, बयालीस का बन गया!...हाँ, हमारे इस प्रकाशन पर इतनी प्रतिक्रियाएँ आई थीं, आप क्या कह रहे हैं!...कई लोगों को विश्वास नहीं हुआ, कहते थे, ऐसा हो नहीं सकता, बर्फ को फैलने दो, मगर चमड़े को तो सिकुड़ना चाहिए, है कि नहीं?!...नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है!...अपने आप पर प्रयोग किया था!...आपको और क्या चाहिए? उस समय पेर्वोमायस्क में सिर्फ इकतालीस नंबर के जूते आये थे. मुझे याद है. और अगर आपको बयालीस नंबर की ज़रूरत हो तो? और तैंतालीस?...हाँ, हमारे पेर्वोमायस्क में मेरे इस प्रकाशन के बाद हर दसवें आदमी के जूते फ्रीज़र में रखे जाते थे!...और आप कह रहे हैं!...”

ये अंतिम शब्द सलव्योव ने रस्तिस्लाव बरीसोविच की अनुपस्थिती में ही कहे.

रस्तिस्लाव बरीसोविच मुँह से एक भी शब्द निकाले बिना हॉल से बाहर निकल गया था. सलव्योव के स्वगत भाषण में सब इतने मगन थे, कि किसी का भी इस ओर ध्यान नहीं गया.

लाइट जलाई गई.

तभी मार्गारीटा मकारोव्ना जागी.

“मैं जैसे ही शैम्पेन पीती हूँ, मेरी आँख लग जाती है.” उसके होठों पर मुस्कान थी: “बाग का सपना आया था...अफ्रीका, शायद?...पूरे नींबू के पेड...”

एलेना ग्रिगोरेव्ना ने, जो टैक्स इन्स्पेक्टर थी, सलव्योव के पास से गुज़रते हुए एक फ़ब्ती कसी:
“आपने बेकार ही में ये किया. वह अपने रहस्य को अपने भीतर समेटे रहता तो बेहतर था.”

“और मेरा शौहर कहाँ है? फिर ग़ायब हो गया?” मार्गारीटा मकारोव्ना ने अनचाही उबासी को हथेली से रोका. “क्या बॉक्स के लिए गया है?”

अब तक रस्तिस्लाव बरीसोविच को सभी मंज़िलों पर ढूँढ़ा जा रहा था. वह कहीं भी नहीं था.

मार्गारीटा मकारोव्ना भारी बदन से कुर्सी से उठी और धीरे-धीरे टेलिविजन की तरफ़ जाने लगी.
स्क्रीन भड़क उठा. हास्य कलाकारों का अगला प्रोग्राम चल रहा था.

********








                  
    
        
                                                                     
        
 
      
       

परीक्षा

    परीक्षा नादेझ्दा तेफ़ी   अनुवाद आ. चारुमति रामदास भूगोल की परीक्षा की तैयारी के लिए तीन दिन दिए गए थे. जिनमें से दो मानिच...